घनी पलकों के परदे में छुपी , मन के किसी कोने में ,
आज बंद लफ़्ज़ों के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है।
उस बेपरवाह पतंग की तरह , जिसकी डोर किसी ने न थामी हो ,
आज खुले आसमां में , लहलहाने की फ़रमाइश है।
एक रुई के फाहे की तरह , बेटोक जो आसानी से हर जगह उड़ चलता है ,
आज उसी सरलता से ,एक अज्ञात लम्बी उड़ान भरने की ख्वाइश है।
टूटते तारे की तरह , सबको अचंभित करते हुए ,
आज स्थिर जगमगाते आकाश को , चीर देने की साजिश है।
छोटी छोटी ठंडी बूंदों की तरह ,जो गर्मी की उमस से मुक्त करती हों ,
आज मेरे थके मन में भी , ताज़ा ख्वाबों की बरसी एक बारिश है।
उस बंद पिंजरे में कैद , फड़फड़ाते उस परिंदे की तरह ,
बरसों से जो उड़ने की आस में हो , आज मेरे मन ने मुझसे जैसे की एक सिफारिश है।
घनी पलकों के परदे में छुपी , मन के किसी कोने में ,
आज बंद लफ़्ज़ों के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है।

- निहारिका प्रसाद
आज बंद लफ़्ज़ों के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है।
उस बेपरवाह पतंग की तरह , जिसकी डोर किसी ने न थामी हो ,
आज खुले आसमां में , लहलहाने की फ़रमाइश है।
एक रुई के फाहे की तरह , बेटोक जो आसानी से हर जगह उड़ चलता है ,
आज उसी सरलता से ,एक अज्ञात लम्बी उड़ान भरने की ख्वाइश है।
टूटते तारे की तरह , सबको अचंभित करते हुए ,
आज स्थिर जगमगाते आकाश को , चीर देने की साजिश है।
छोटी छोटी ठंडी बूंदों की तरह ,जो गर्मी की उमस से मुक्त करती हों ,
आज मेरे थके मन में भी , ताज़ा ख्वाबों की बरसी एक बारिश है।
उस बंद पिंजरे में कैद , फड़फड़ाते उस परिंदे की तरह ,
बरसों से जो उड़ने की आस में हो , आज मेरे मन ने मुझसे जैसे की एक सिफारिश है।
घनी पलकों के परदे में छुपी , मन के किसी कोने में ,
आज बंद लफ़्ज़ों के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है।
- निहारिका प्रसाद