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Friday, 3 April 2026

​पुणे और मैं

 

​कैसे मैं ये शहर छोड़ जाऊं,

कैसे मैं अब कहीं और मन लगाऊं?

दगडूसेठ की वो मूरत, वो चमकती हुई सूरत,

कैसे अपनी आँखों से मैं उसे हटाऊं?

​चतुर्थी की भीड़ में खुद को छोटा कर लेना,

बस एक झलक तेरी मिल जाए, ये दुआ कर लेना।

तुलसीबाग की गलियों में तू अचानक दिख जाता है,

अनजान रास्तों पर भी तेरा साथ मुझे सुरक्षित बनाता है।

​कभी पातालेश्वर की ठंडी चट्टानों से लगकर सुकून पाया,

तो कभी दुर्गा टेकड़ी से इस हरे-भरे शहर को निहारा।

ओशो पार्क के वो मरून कपड़े, वो गहरी खामोशी,

या आगा खान पैलेस के पेड़ों में छिपी वो मदहोशी।

​ओकायामा गार्डन की शांति हो या शहर की रंगीन रातें,

इस शहर ने हर शख्स से की हैं, अलग-अलग बातें।

कहते हैं लोग कि, मैं यहाँ की 'पुणेकर' नहीं हूँ,

पर इसके हर कोने को जानती हूँ, मैं अजनबी नहीं हूँ।

​बचपन से एक खिंचाव था तुझसे, एक गहरा नाता,

जैसे यहाँ लौटकर आना मुझे कुदरती तौर पर था भाता।

पर अब जा रही हूँ, समेटकर अपनी सारी दुनिया,

आँखों में यादें और दिल में एक अधूरा सा सपना।

​सामान के बीच, एक छोटा सा गणेश संभलकर रखा है,

पुणे का बस यही एक हिस्सा अब मेरे पास बचा है।

कैसे मैं ये शहर छोड़ जाऊं,

कैसे मैं अब कहीं और मन लगाऊं?

Friday, 27 March 2026

My Love

 

​When they speak of love, I think of you.

They don’t believe me—they think I go to the coast

To meet a person, to find a hand to hold.

They stand with their backs to you,

Clicking pictures with you as a background.

But to me, you are not the background.

You are my muse.

​I have loved you since I was a child.

You and I are the same:

Wild, shifting, restless.

We cannot stay still.


They ask, "How can you love something that isn't alive?"

But to me, you are more alive than anything.

​You never bore me.

In the rosy morning, you are calm and quiet.

Under the moonlight, you are fierce and wild.

Sometimes you touch me with a soft caress,

Other times you challenge me with your mighty waves.

This push and pull—is what keeps our love fresh.

​They think you are just a metaphor in my poems.

How do I explain that I really love you?

Drag me into your depths until I forget the world.

And when I am gone, let my ashes be thrown into your water.

So that I may finally, truly, be free.



Saturday, 29 November 2025

बड़े और छोटे शहर

 

सच है कि जितनी लाइट्स
एक बड़े शहर के एक बिलबोर्ड पर होती,
उतने हमारे पूरी गली पर नहीं—
पर कहानी यहीं से शुरू होती है।

हम अपने छोटे शहर की मिट्टी की खुशबू लेकर
जब किसी बड़े शहर की सीधी, चमकती सड़कों पर चलते हैं,
तो लगता है धड़कन अलग है सही,
पर देश की कहानी एक ही है।

हमारे छोटे शहर में जिस हिम्मत से
एक लड़का एक लड़की को चाय–कॉफ़ी पर पूछता है,
उतने में तो एक बड़े शहर का लड़का
रात भर के प्लान्स आसानी से बना लेता है।

और वहाँ किसी शो के शुरू होने से पहले ही
कैमरे निकल आते हैं—
शायद इसलिए क्योंकि रील्स कभी–कभी
पल को जीने से ज़्यादा ज़रूरी लगती हैं।

हमारे छोटे शहर में BookMyShow नहीं,
पर बड़े शहर में कहानियाँ बिकती हैं—
लोग अपने दर्द को स्टेज पर रखकर
तालियों में सुकून ढूँढते हैं,
जैसे ख़ुशी भी एक टिकटेड इवेंट हो।

फिर भी, घर पे चाय–समोसे के लिए
कोई नहीं बुलाता,
और सालों से रहकर भी
बड़ा शहर कभी–कभी
अजनबी सा महसूस होता है।

कहता है बड़े शहर की चमक:
“यहाँ सब कुछ बिकता है।”
काश Blinkit से
दो प्यार के शब्द भी ऑर्डर किए जा सकते।

एक भाषा ने कभी हमें पराया समझा,
और दूसरी ने हमारे छोटे शहर को पिछड़ा बोला—
पर हम जानते हैं,
ना भाषा इंसान को छोटा बनाती है
ना शहर बड़ा।

क्या मॉल्स, PVR, ऊँची बिल्डिंग्स
और सपाट सड़कें ही ऊँचाई का माप हैं?
क्या भावनाएँ, रिश्तों की गर्माहट
और कल्चर का कोई मोल नहीं?

और जब हम सब सीना तानकर
जन गण मन गाते हैं,
तो क्या हम खुद को
सिर्फ़ भारतीय नहीं समझते?

अगर छोटा शहर पिछड़ा है
तो देश का कोई हिस्सा पिछड़ा है—
और देश हिस्सा–हिस्सा होकर नहीं चलता,
पूरा मिलकर बढ़ता है।

इसलिए हम आज भी गर्व से कहते हैं:
“हम अपने छोटे शहर से आए हैं।”

सच है कि जितनी लाइट्स
एक बड़े शहर के एक बिलबोर्ड पर होती,
उतने हमारे पूरी गली पर नहीं—
पर दिल का उजाला,
हमारे ही छोटे शहर में होता है।




                                                                                                                                   निहारिका प्रसाद

Saturday, 1 November 2025

My Heart

 

I carry my heart to distant places

Only to numb the pain


Only to watch it rekindle

Pricking me again and again


I distracted it with pretty lights

Vibrant colors, breathtaking sights


But like a massive glacier crumbles 

Under its own weight


I cannot hold back my tears

Can one change their fate?


My heart is not glass, it is porcelain

Fragile and yet opaque


Concealing my tender emotions

And fears which keep me awake


As I click photographs for random strangers

As I smile, watching them smile


I wonder if I have to forge my heart

In iron, to mask the ache awhile


Or will you gallantly save it?

So the ice melts, with gushing of blood


Come, heal me softly, if only you could,

My heart, a green-leaved tender bud




Niharika Prasad