कैसे मैं ये शहर छोड़ जाऊं,
कैसे मैं अब कहीं और मन लगाऊं?
दगडूसेठ की वो मूरत, वो चमकती हुई सूरत,
कैसे अपनी आँखों से मैं उसे हटाऊं?
चतुर्थी की भीड़ में खुद को छोटा कर लेना,
बस एक झलक तेरी मिल जाए, ये दुआ कर लेना।
तुलसीबाग की गलियों में तू अचानक दिख जाता है,
अनजान रास्तों पर भी तेरा साथ मुझे सुरक्षित बनाता है।
कभी पातालेश्वर की ठंडी चट्टानों से लगकर सुकून पाया,
तो कभी दुर्गा टेकड़ी से इस हरे-भरे शहर को निहारा।
ओशो पार्क के वो मरून कपड़े, वो गहरी खामोशी,
या आगा खान पैलेस के पेड़ों में छिपी वो मदहोशी।
ओकायामा गार्डन की शांति हो या शहर की रंगीन रातें,
इस शहर ने हर शख्स से की हैं, अलग-अलग बातें।
कहते हैं लोग कि, मैं यहाँ की 'पुणेकर' नहीं हूँ,
पर इसके हर कोने को जानती हूँ, मैं अजनबी नहीं हूँ।
बचपन से एक खिंचाव था तुझसे, एक गहरा नाता,
जैसे यहाँ लौटकर आना मुझे कुदरती तौर पर था भाता।
पर अब जा रही हूँ, समेटकर अपनी सारी दुनिया,
आँखों में यादें और दिल में एक अधूरा सा सपना।
सामान के बीच, एक छोटा सा गणेश संभलकर रखा है,
पुणे का बस यही एक हिस्सा अब मेरे पास बचा है।
कैसे मैं ये शहर छोड़ जाऊं,
कैसे मैं अब कहीं और मन लगाऊं?