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Saturday, 29 November 2025

बड़े और छोटे शहर

 

सच है कि जितनी लाइट्स
एक बड़े शहर के एक बिलबोर्ड पर होती,
उतने हमारे पूरी गली पर नहीं—
पर कहानी यहीं से शुरू होती है।

हम अपने छोटे शहर की मिट्टी की खुशबू लेकर
जब किसी बड़े शहर की सीधी, चमकती सड़कों पर चलते हैं,
तो लगता है धड़कन अलग है सही,
पर देश की कहानी एक ही है।

हमारे छोटे शहर में जिस हिम्मत से
एक लड़का एक लड़की को चाय–कॉफ़ी पर पूछता है,
उतने में तो एक बड़े शहर का लड़का
रात भर के प्लान्स आसानी से बना लेता है।

और वहाँ किसी शो के शुरू होने से पहले ही
कैमरे निकल आते हैं—
शायद इसलिए क्योंकि रील्स कभी–कभी
पल को जीने से ज़्यादा ज़रूरी लगती हैं।

हमारे छोटे शहर में BookMyShow नहीं,
पर बड़े शहर में कहानियाँ बिकती हैं—
लोग अपने दर्द को स्टेज पर रखकर
तालियों में सुकून ढूँढते हैं,
जैसे ख़ुशी भी एक टिकटेड इवेंट हो।

फिर भी, घर पे चाय–समोसे के लिए
कोई नहीं बुलाता,
और सालों से रहकर भी
बड़ा शहर कभी–कभी
अजनबी सा महसूस होता है।

कहता है बड़े शहर की चमक:
“यहाँ सब कुछ बिकता है।”
काश Blinkit से
दो प्यार के शब्द भी ऑर्डर किए जा सकते।

एक भाषा ने कभी हमें पराया समझा,
और दूसरी ने हमारे छोटे शहर को पिछड़ा बोला—
पर हम जानते हैं,
ना भाषा इंसान को छोटा बनाती है
ना शहर बड़ा।

क्या मॉल्स, PVR, ऊँची बिल्डिंग्स
और सपाट सड़कें ही ऊँचाई का माप हैं?
क्या भावनाएँ, रिश्तों की गर्माहट
और कल्चर का कोई मोल नहीं?

और जब हम सब सीना तानकर
जन गण मन गाते हैं,
तो क्या हम खुद को
सिर्फ़ भारतीय नहीं समझते?

अगर छोटा शहर पिछड़ा है
तो देश का कोई हिस्सा पिछड़ा है—
और देश हिस्सा–हिस्सा होकर नहीं चलता,
पूरा मिलकर बढ़ता है।

इसलिए हम आज भी गर्व से कहते हैं:
“हम अपने छोटे शहर से आए हैं।”

सच है कि जितनी लाइट्स
एक बड़े शहर के एक बिलबोर्ड पर होती,
उतने हमारे पूरी गली पर नहीं—
पर दिल का उजाला,
हमारे ही छोटे शहर में होता है।




                                                                                                                                   निहारिका प्रसाद

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