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Wednesday, 24 September 2025

स्वप्न में आई माँ

 

मैं न मानने वाली थी, पर आज देखा सपना यू,

बड़ी-बड़ी तेरी आँखें, काले घुँघराले बाल सुना यू।

चाँदी के झुमके, नक्काशी जैसे, रोशनी का ताज,
भक्तों की आवाज़ें, ढोलक की थाप, मन में रच गया साज।

ओ माँ, ओ माँ, तेरी छवि ने कर दिया उजास,
मन में बस गईं तुम, हर सांस में तेरा आभास।

पंडाल की यादें लौटीं, बचपन के रंग, भीड़ और धुन,
न मानने वाली भी झूमी, छू लिया किसी तरंग ने जुनून।
न धर्म की डोरी, न नाम का दायरा, बस तेरा आभास,
धन्य मैं कि आईं तुम ऐसे, सीधी, सरल, प्यार भरी और उजास।

ओ माँ, ओ माँ, तेरी छवि ने कर दिया उजास,
मन में बस गईं तुम, हर सांस में तेरा आभास।

अब शहर की हलचल में भी, तेरे गीत का सुरूर है,
सपनों की रात में भी, तेरी छवि का नूर है।
मैं न पूजक, न पीछे चलने वाली — बस एक स्त्री, मान गई यू,
तुम आई थीं सपने में, और मेरे भीतर कुछ बदला सा जाता यू।

ओ माँ, ओ माँ, तेरी छवि ने कर दिया उजास,
मन में बस गईं तुम, हर सांस में तेरा आभास



                                                      निहारिका प्रसाद


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