मैं किनारे पर खड़ी, तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ,
अपनी कविताओं में तुम्हें ही याद करती हूँ।
उन्हें लगता कि तुम कोई काल्पनिक शक्स हो,
पर तुम ही तो मेरी सबसे सच्ची हकीकत हो।
रेत के बीच धंस रही हैं पांव की उंगलियां,
पर तू आया और फिर यूं ही चल दिया।
मां पूछती थी छुट्टियों में, इस बार कहां जाना है,
मैं बोलती, वही तो, जहां समुद्र का किनारा है।
तुम्हारी गोद से नन्हे सीपों को चुनती,
फिर उनको पिरो कर एक सुंदर माला बनाती।
बचपन की यादें भी तुमसे जुड़ी हैं,
मेरे बालों को छेड़ना, यह तेरी नखट अदा है।
तुम्हारे ठंडे शीतल पानी में सारे गम भूल जाऊं,
तुम्हारी ही ओर खिंची चली आऊं।
किसी और की जुदाई मन को उतना विचलित नहीं करती,
पर तेरे लहरों के पीछे सरकने से, एक घबराहट मचती।
तेरा और मेरा रिश्ता उनको कैसे समझाऊं,
शायर का मन है, उन्हें क्या क्या समझाऊं।
तेरी लहरों के साए में मैं चैन से सो जाऊं,
इस पत्थर दिल दुनिया से दूर बस तुझमें खो जाऊं।
— निहारिका प्रसाद
