Translate

Pages

Friday, 18 September 2026

समुद्र और मैं

 

मैं किनारे पर खड़ी, तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ,

अपनी कविताओं में तुम्हें ही याद करती हूँ।


​उन्हें लगता कि तुम कोई काल्पनिक शक्स हो,

पर तुम ही तो मेरी सबसे सच्ची हकीकत हो।


​रेत के बीच धंस रही हैं पांव की उंगलियां,

पर तू आया और फिर यूं ही चल दिया।


​मां पूछती थी छुट्टियों में, इस बार कहां जाना है,

मैं बोलती, वही तो, जहां समुद्र का किनारा है।


​तुम्हारी गोद से नन्हे सीपों को चुनती,

फिर उनको पिरो कर एक सुंदर माला बनाती।


​बचपन की यादें भी तुमसे जुड़ी हैं,

मेरे बालों को छेड़ना, यह तेरी नखट अदा है।


​तुम्हारे ठंडे शीतल पानी में सारे गम भूल जाऊं,

तुम्हारी ही ओर खिंची चली आऊं।


​किसी और की जुदाई मन को उतना विचलित नहीं करती,

पर तेरे लहरों के पीछे सरकने से, एक घबराहट मचती।


​तेरा और मेरा रिश्ता उनको कैसे समझाऊं,

शायर का मन है, उन्हें क्या क्या समझाऊं।


​तेरी लहरों के साए में मैं चैन से सो जाऊं,

इस पत्थर दिल दुनिया से दूर बस तुझमें खो जाऊं।


​— निहारिका प्रसाद




No comments:

Post a Comment